Sunday, June 17, 2012

अर्धनिर्मित

यहाँ कोई मित्र नहीं है, कोई आश्वस्त चरित्र नहीं है,
सब अर्धनिर्मित है|
अर्धनिर्मित इमारतें हैं, अर्धनिर्मित बच्चों कि शरारतें हैं,
अर्धनिर्मित ज़िन्दगी कि शर्ते हैं,
अर्धनिर्मित जीवन पाने के लिए लोग रोज़ यहाँ मरते हैं|
अर्धनिर्मित है यहाँ के प्रेमियों का प्यार,
अर्धनिर्मित है यहाँ मनुष्यों के जीवन के आधार|
आज का दिन अर्धनिर्मित है,
न धूप है, न छाओं है,
मंजिल कि डगर से विपरीत चलते पाँव है||
अर्धनिर्मित सी सेहत है,
न कभी देखा निरोगी काया को, न कभी दिल से कहा अलविदा माया को,
हमारी अर्धनिर्मित सी कहानी है, अर्धनिर्मित हमारे युवाओं कि जवानी है|
हम रोज़ एक अर्धनिर्मित शय्या पर लेटे हुए एक अर्धनिर्मित सा सपना देखते हैं,
उस सपने में हम अपनी अर्धनिर्मित आकांक्षाओं को आसमानों में फेंकते हैं|
आसमान को भी इन आकांक्षाओं को समेटकर अर्धनिर्मित होने का एहसास होता होगा,
क्योंकि यह आकांक्षाएं हमारी नहीं आसमान की है,
बिलकुल वैसे ही जैसे यह अर्धनिर्मित गाथा तुम्हारी है और आयुष्मान की है|

Monday, June 4, 2012

मुखौटे

चहरे ये मुखौटे हैं,
मुखौटे ही तो चहरे हैं |
अन्दर का राम जला दिया,
कैसे उल्टे पड़े दशहरे हैं |
अपनी ही आवाज़ सुन ना पाएं,
पूर्ण रूप से बहरे हैं |
मन की नदी उफान पा ना सकी,
पर हम दिखते कितने गहरे हैं|
ये मुखौटे कोई उतार ना ले,
लगा दिए लाखों पहरे हैं |
चहरे ये मुखौटे हैं,
मुखौटे ही तो चहरे हैं |

Sunday, March 18, 2012

मनुष्य खगोल

तारे जो नज़र आते हैं नभ में,
वैसी ही कहानी बनी सब में,
ऐसा लगता है मानो दुनिया कि छत पे एक विशाल आइना जड़ा हो,
बिलकुल मुझ जैसा एक मनुष्य सुदूर मेरे ऊपर खड़ा हो |
वो मनुष्य रुपी तारा है,
मेरे जीवन का सारांश सारा है |
धरा पे जितना अँधेरा नभ में उतने तारे नज़र आते हैं,
इससे पता चलता है कि एक स्थान के अंधकार से दूसरे के उजाले नज़र आते हैं|
जैसे ही सुबह हो जाती है,
तारो कि दुनिया नज़र नहीं आती है,
सिर्फ एक प्रमुख तारा सूर्य छा जाता है,
भूमंडल कि चकाचौंध को स्वयं खा जाता है |
चंद्रमा या आफताब,
एक प्राकृतिक उपग्रह या किसी पतिव्रता का ख्वाब,
यह चाँद आकाश का ध्वज है,
किसी गरीब मुसलमान कि इकलौती हज है |
आज नभ में एक टूटा तारा था,
जिसको वायुमंडल का सहारा था,
मतलब कम से कम यह तारे औंधे मुँह तो नहीं गिरते धरा पर,
नष्ट हो जाते हैं नभ और ज़मीन के बीच न जाने कहाँ पर|
वैसे ही शायद मनुष्य है,
उसकी मृत्यु एक सरल रहस्य है,
हम भी ज़मीन से सीधा ऊपर नहीं जाते हैं,
कहीं बीच में ही अटक जाते हैं,
अधिकाँश लोग मरणोपरांत भटक जाते हैं,
और चंद खुशनसीब खुद से और खुदा से लिपट जाते हैं|

Tuesday, February 21, 2012

हवा

ठण्डी हवा, तेज़ हवा
काली हवा, अंग्रेज़ हवा,
तिब्बत का भूकम्प थी चीनी हवा,
कश्मीर में फिरती है असमंजस की भीनी हवा |
यहूदियों की इसरयाली सख्त हवा,
मुसलमानों का बहाती रक्त हवा,
मिस्र में प्राचीन शिल्पकारों की कृति नष्ट करती हवा,
वहीँ थोड़े पूरब के मरूस्थल में खुद शिल्पकार बनने का कष्ट करती हवा |
हिंदुकुश की पहाड़ियों में हिन्दू खुश ना रखती हवा,
मज़हब की जिद्दी आंधी में शायद, कुछ भी ना कर सकती ये हवा
वहाँ जापान में हवा समूह में फिरती है, तो बन जाती बवंडर ये हवा,
ऊपर नीचे आगे पीछे कामुक छलांगे लगा कर छोड़ जाती खण्डर ये हवा |
उत्तर-भारत के योगी बाबा के श्वास की हवा,
दक्षिण के भोगी बाबा के अन्धविश्वास की हवा,
देश वासियों की अन्ना में क्षण-भर के विश्वास की हवा,
बहती है अध्यात्मिक प्रदूषण की बकवास की हवा |
वक़्त की रफ़्तार समझ आती है, हवा की नहीं
रूकती नहीं है ये हवा,
थकती नहीं है ये हवा,
दिखती नहीं है ये हवा,
और हाँ, मनुष्य की तरह बिकती नहीं है ये हवा!